લ્યો, આ ચીંધી આંગળી : हिंदी फिल्मसंगीत के चाहनेवालोंके लिये एक अमूल्य तोहफा

રજનીકુમાર પંડ્યા

(આ વખતને લેખ વ્યાપક વિષયવસ્તુ ધરાવતો હોવાથી અપવાદરૂપે તેને હિન્‍દીમાં લખ્યો છે, જેથી હિંદીભાષી વાચકોને એ વાંચવામાં સુવિધા રહે.

રજનીકુમાર પંડ્યા)

हिंदी फिल्म संगीत के चाहनेवालों की तादाद गिनती से परे है और परे ही रहेगी । उसमें भी बहुत से Cross sections  हैं। आज के समय में प्रारंभिक दौर १९३१ से ले कर १९४० तक के हिंदी फिल्म संगीत के चाहनेवाले समय और रुचि के बदलाव के हिसाब से भले ही कम हों, लेकिन १९४१ और इस के बाद में मास्टर गुलाम हैदर, अनिल बिस्वास, नौशाद अली जैसे संगीतकारों के आगमन के पश्चात संगीत की स्वररचना और वाद्यवृंदके नियोजन में जो धरामूल बदलाव आया उस के कायल रसिकों की संख्या का तो कोई अंदाजा भी लगाना असंभव है।

दूसरे शब्दों में हिंदी फिल्म संगीत जो सन १९३१ में एक छोटा-सा ,पतला-सा, भूमि-झरना था, वो आज एक असीम महासागर में परिवर्तित हो गया है । उस की अथाह जलराशि में शास्त्रीय संगीत, अर्ध शास्त्रीय संगीत, कोठासंगीत, प्रादेशिक व लोकसंगीत, अलग अलग धर्मों का भक्तिसंगीत, स्वयंस्फूर्त संगीत, विदेशी स्वररचनाएं जैसी कई अलग अलग धाराएं घुली हुई हैं । इसमें से कोई अपने तरीके से, कोई एक अंग को ले कर हिंदी फिल्म संगीत का अभ्यासनिष्ठ विश्लेषण करना चाहे तो यह बिल्कुल नामुमकिन सी बात प्रतीत होती है ।   

लेकिन इस नामुमकिन से अभ्यासविषय को मुमकिन करार देने वाले एक अनन्य सज्जन हैं लखनऊ के श्री के एल पांडेय, जो खुद एक आइ. आर. टी. एस. (आइ. ए. एस. की समकक्ष इंडीयन रैलवे ट्राफिक सर्विस) सेवानिवृत्त अफसर हैं और भारतीय रेलवे बोर्ड के एक अपर सदस्य जैसे प्रतिष्ठित पद पर आसीन रह चुके है । लेकिन उनकी सही और विशेष गौरवान्वित पहचान एक आला दर्जे के श्रेष्ठ संगीतशास्त्री (Musicologist)की है।

अब यह जानना भी आवश्यक होगा कि  श्री के एल पांडेयजी के कथन अनुसार सवाक फिल्मों के आगमन के वर्ष १९३१ से ले कर जून २०२० की समयावधि में १३,२००से तनिक अधिक हिंदी फिल्में सेन्सर बोर्ड द्वारा पारित की गई हैं और उस में कुल मिलाके ८१,०००से तनिक अधिक गानें समाविष्ट रहे हैं। इनमें से 15000 से भी अधिक गाने अब उपलब्ध भी नहीं है क्योंकि न तो उन गानों के रिकॉर्ड बने और ना ही यह फ़िल्में संरक्षित हो पाईं। मतलब यह कि ८१,००० गानों में से सिर्फ़ ६६,००० गानें ही प्राप्य हैं।

(श्री के.एल.पांडेय)

इन ६६,००० गानों में से श्री पांडेजी ने अपने विश्लेषण कार्य के लिये बाकी ६,२०० चयनित फ़िल्मों के २०,००० गानों का ही चयन किया, जिसमें ज्यादातर प्रचलित गानें और जिनमें शास्त्रीय अंग ज्यादा प्रबल हो, ऐसे गाने ही थे ।

इस कठिन कार्य का उद्देश्य हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत तथा हिन्दी फिल्म संगीत की अलग-अलग धाराओं के मध्य सेतु बनाने जैसा है ताकि हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत जैसी विशाल सांस्कृतिक धरोहर को आसानी से उपलब्ध, बोधगम्य एवं लोकप्रिय हिन्दी फिल्म संगीतके माध्यम से अच्छी तरह से समझा जा सके तथा उसे जन-जन तक पहुँचाया जा सके |

उन्होंने १९३१ से ले कर अगस्त २०१७ तक पर्दे पर प्रस्तुत इस ५,७०० से भी अधिक हिंदी फिल्मों के १७,००० से भी ज्यादा गीतों के राग विष्लेषण की फलश्रुति अपने तीन बडे बडे खंडों में विभाजित  हिंदी ग्रंथ ‘हिंदी सिनेराग एन्साइक्लोपीडीया’ के प्रथम संस्करण के रूप में परोसी है। इसका विमोचन संगीतकार पद्मश्री आनंदजी भाई ( कल्याणजी -आनंदजी) के वरद हस्तों से किया गया था । अब इस महाग्रंथ श्रेणीका रागानुसार तरीके से दूसरा संस्करण भी तैयार है जिसे इस माह के अन्त तक आ जाने की सम्भावना है, जिसमें पांडेजी का निष्कर्ष है इन गीतों में कि कुल मिलाकर १७४ राग पाये गये हैं। इन २०,००० फिल्मी गीतों में सबसे अव्वल राग पहाडी को पाया गया, जिस के ऊपर कुल मिलाकर ५,३०० गाने पाये गये हैं, और दूसरे क्रम पर खमाज (३,५००), नटभैरवी अथवा शुद्ध ऋषभ की भैरवी (३,२००),  काफ़ी (२,६००),  भैरवी (२,२००), कीरवानी (१,०००), पीलू(९००), यमन एवम यमन कल्याण (६००), बिलावल (८००),  झिंझोटी (७००) और चारुकेशी (५००) और कई गानें तो उस रागों के विशुद्ध रुप से या उसके संमिश्रण से निर्मित किये गये हैं, जिसमें रागमालिकायें और लक्षण गीत भी सम्मिलित हैं ।

यह पूरा विश्लेषण एक टेब्युलर स्वरूप में, निम्नलिखित तरीके से ९ स्तंभों में दिया गया है ।       

गीत का मुखडा, फिल्म का नाम, फिल्म की प्रस्तुतिका वर्ष, गायक कलाकार का नाम,गीतकार का नाम,संगीतकार का नाम, ताल, स्केल,और गीतमें सम्मिलित रागों की क्रमानुसार प्रस्तुति।

(नमूने का पृष्ठ)

वे अपने इस अमूल्य महाग्रंथ के प्राक्कथन (Preface) में क्या कहते हैं ?

वे लिखते हैं: ‘हिन्दी फिल्मी गीतों में शास्त्रीय संगीत को ढूंढना समुद्र को खंगालने जैसी बात है | फिर इन व्याप्त धारणाओं से कि शास्त्रीय संगीत पर आधारित गीतों की संख्या बहुत कम है, फिल्मी गीतों में राग तो होता ही नहीं – छाया मात्र हो सकती है या मिश्रण रहता है; इन गीतों ने शास्त्रीय संगीत की शुद्धता को दूषित किया है; फिल्मकारों को शास्त्रीय संगीतसे प्रयोजन कम रहता है क्योंकि उन्हें अपनी फिल्म का व्यावसायिक पक्ष अधिक देखना रहता है, आदि से यह कार्य अत्यन्त ही दुष्कर हो जाता है |

मेरे विचार से शास्त्रीय संगीत माधुर्य का व्याकरण है, इसलिए यदि किसी गीत में माधुर्य लाना है तो उसमें किसी न किसी रुप में शास्त्रीय संगीत का प्रयोग अनिवार्य हो जाएगा | यह सप्रयास एवं पूर्व नियोजित ढंग से हो सकता है अथवा एक माधुर्यपूर्ण संगीत रचना को ससंरचित करते समय अप्रयास तथा अपूर्वनियोजित ढंग से भी हो सकता है ! इस कारण से किसी भी फिल्मी गीत की रचना में यदि माधुर्य है तो उसमें हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का प्रयोग अवश्य होगा अर्थात उसमें किसी एक या कई रागों की उपस्थिति अवश्य होगी | यह उपस्थिति शुद्ध रुप से हो सकती है अथवा मिश्रित रुप से भी हो सकती हैं |

मैंने अपनी टीम के साथ १९३१ से २०२० के मध्य बनी हिन्दी फिल्मों में से लगभग ६२०० चयनित फिल्मों के २०,००० से अधिक गीतों के शास्त्रीय पक्ष का विश्लेषण किया है, जिसमें १४ वर्ष से अधिक समय लगा है | इस कार्य में प्रत्येक गीत को पूरा सुनकर तथा उसे वाद्ययंत्रो पर बजाकर पहले उसके मूल स्वर अर्थात ’सा’ को पहचाना गया है, तदुपरान्त स्वरों के चलन को ध्यान से देखते हुए यह प्रयास किया गया है कि वे किस राग के व्याकरण का अनुगमन कर रहे हैं ! व्यावहारिकता को ध्यान में रखते हुए विद्वान वादकों से क्षमाप्रार्थी होते हुए गीत के केवल गेय पक्ष अथवा वोकल्स का ही विश्लेषण किया गया है तथा प्रील्यूड तथा ईन्टरल्यूड्स का विश्लेषण नहीं किया गया है | साथ ही कई गीतों में मुख्य रुप से प्रयुक्त राग तथा अन्य रागों की उपस्थिति के कारण हुए मिश्रण तथा अलग-अलग अंतरो में समान रुप से अलग –अलग रागों के प्रयोगसे मुख्य राग का निर्धारण भी सम्म्भव नहीं हो पा रहा था, इसलिए पूरे गीत में प्रारम्भ से अन्त तक आने वाले रागों को उपस्थिति के क्रमानुसार दर्शाया गया है | इसी प्रकार गीत में प्रयुक्त तालों को भी उपस्थिति के क्रमानुसार दर्शाया गया है |  उदाहरण स्वरूप यदि किसी गीत में पहले राग भीमपलासी आता है तथा उसके बाद काफ़ी आता है तो उसे (भीमपलासी+ काफ़ी) तथा यदि काफ़ी पहले आता है तदुपरान्त भीमपलासी आता है तो उसे (काफ़ी + भीमपलासी ) दर्शाया गया है | यही एक गीत में प्रयुक्त कई स्केलों तथा कई तालों के साथ भी किया गया है |’

यह कार्य अत्यन्त दुष्कर था लेकिन गुरुजनों के आशीर्वाद से एवं विद्व्ज्जनों के संबल से ही सम्भव हो सका है | ‘सा’ के निर्धारण के अनुरुप राग विश्लेषण में हमारे विद्वान कलाकारों एवं संगीतविदों से मत वैभिन्य भी हो सकता है, जिसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ | मैंने विभिन्न पुस्तकों में उपलब्ध विश्लेषणों को आधार न बनाते हुए प्रत्येक गीत का नए सिरे विश्लेषण किया है, जो मेरे एवं मेरी टीम के विचारों के अनुरुप है | इस सम्बन्ध में किसी भी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत रहेगा ताकि विश्लेषण में उत्तरोत्तर सुधार किया जा सके | गीत के मुखडे, फिल्म के नाम, सेंसर वर्ष, गायक कलाकार, गीतकार तथा संगीतकारों के नाम उपलब्ध पुस्तको तथा इन्टरनेट पर उपलब्ध विश्वस्त जानकारी के अनुरुप है, इनमें भी सुधारका सदैव स्वागत रहेगा | गीतों को उनके प्रचलित रुप के अनुसार ही अंग्रेजी वर्णक्रम के अनुरुप क्रमबद्ध किया गया है ताकि उन्हें शीघ्र ढूंढने में आसानी हो सके | प्रथम संस्करण 3 खंडों में अंग्रेज़ी, हिन्दी द्विभाषीय रूप में था, जिसमें कुल १,९०० पृष्ठ थे। द्वितीय संस्करण केवल अंग्रेज़ी में है और इनमें ३,०००से अधिक गीतों के विश्लेषण को जोड़ा भी गया है अर्थात कुल मिला कर २०,००० से अधिक गीतों का विश्लेषण है। केवल अंग्रेज़ी में होने के कारण कुल पृष्ठों की संख्या घट कर १,२५० रह गई है और इन्हें 3 के स्थान पर केवल दो हार्डबाउंड खंडों में ही समायोजित कर पाना सम्भव हो सका है।

(शीघ्रप्रकाश्य)

पूरे विश्लेषण का रागानुसार प्रस्तुतीकरण अर्थात हर राग की अलग अलग १७४ टेबल के साथ वॉल्यूम ३,४ एवं ५ भी तैयार हैं जो द्वितीय संस्करण के वॉल्यूम १ एवं २ के बाद रिलीज़ होंगे।‘

(रजनीकुमार पंड्या के साथ श्री पांडेयजी)

यह कोई व्यावसायिक निर्मिती नहीं है । न तो श्री पांडेजी कोइ व्यावसायिक लेखक है । उन्होंने कोइ मुनाफा करने वाले प्रकाशक की बजाय अपने आप इस महाग्रंथ का प्रकाशन किया है । अततः उसे अपने घर बैठे प्राप्त करने के पुस्तक के दो खंडो के लिये बिक्री मूल्य रुपये ४,२०० की राशी तय की गइ है । पांडेजी अपनी और से कुछ ज्यादा रियायत भी दे सकते हैं और पोस्टेज इत्यादि भी वे खुद भुगतेंगे। 

और इसे प्राप्त करने लिये संपर्कसूत्र :

Shri K L Pandey. Mobile -91295 06111

H-601, Celebrity Gardens, Sushant Golf City, ShahidPath, Sultanpur Road,

LUCKNOW-226 030  ( U.P.)

Email: kanhayaabha@gmail.com


लेखकसंपर्क: रजनीकुमार पंड्या, अहमदावाद- 95580 62711 या इ मेल- rajnikumarp@gmail.com

Author: Web Gurjari

5 thoughts on “લ્યો, આ ચીંધી આંગળી : हिंदी फिल्मसंगीत के चाहनेवालोंके लिये एक अमूल्य तोहफा

  1. Thank you so much Pandya Ji. The article is so wonderful, covering all the important aspects. Shall send you when the books come out. Regards, K.L.Pandey

  2. यह कोई ऋषिकार्य से कम नहीं है. निःस्वार्थभाव से किया गया कार्य करनेवाले श्रीमान पांडेजी को नतमस्तक वधाई प्रदान करता हूँ.

    1. आदरणीय पीयूष पण्ड्या जी,
      बहुत बहुत धन्यवाद. मैं ईश्वर की इसे विशेष कृपा समझता हूँ की उसने इस बड़े कार्य के लिये मुझे चुना. मैंने कई बार यह अनुभव किया की कोई अदृश्य शक्ति मुझे सतत सम्बल दे रही है. इस समय मैं साथ साथ दो कार्य कर रहा हूँ. एक, इस एन्साइक्लपीडिया का रागानुसार ३ वॉल्यूम्ज़ में १७४ रागों की अलग अलग टेबल्ज़ में तैयारी और दूसरा लगभग ५००० ग़ैर फ़िल्मी गीतों, भजनों, ठुमरियों एवं ग़ज़लों का राग विश्लेषण. १९०२ से आज तक की. यह कार्य भी अगले ६ माह में पूरा करने का प्रयास करूँगा. बस आप सब की शुभकामनाएँ चाहिए. धन्यवाद.🙏🙏🙏🙏🙏

  3. I have come across a web apparatus : Picture: This is able of distinguishing 10,000+ species of plants with an accuracy of 98%. Can we develop a software that recognize આપણાં સંગીત શાસ્ત્ર પ્રમાણે ગીત કે બંદિશ નો “રાગ” ?  

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